Friday, October 13, 2017

TV डिबेट या गली का झगड़ा

यूंं तो पहले ही दूर दर्शन अर्थात टीवी बहुत कम देखा करता था, अौर जब कभी देखता था तो चंद गिने चुने चैनलों को ही देखता था। मझे समाचार से ज्यादा डिबेट देखना अच्छा लगता था। हालांकि यह बहुत पुराने समय की बात नहीं है, फिर भी आज से कुछ वर्षों पहले ही टीवी पर किसी भी विषय को लेकर चर्चा होती तो उस चर्चा में उपस्थित  सभी अतिथिगण बहुत भद्र अौर शालीन हुआ करते थे।
अब डिबेट चलते हुए किसी भी चैनल के सामने जाने से ही मन सिहरने लगता है। जी हां मैं सत्य बोल रहा हूं।
आज अब डिबेट अौर चर्चा बाजारू हो गई है। क्या पता कब कोई रंगीन महाराज जी क्रोधित होकर महिला पर सरे आम हाथ उठा दें। फिर क्या बच्चों को हम यही शिक्षा देंगे। आने वाली नसलें जब तक अपने आप में खोई हुई हैं, सोई हुई हैं वही ठीक है अन्यथा वह यही सब आचरण सीखेगी।

आज के डिबेट डिबेट न हुए गली नुक्कड़ में सिर धुंते जुवे बाजों की आपसी लड़ाई होगई! झूठा व्यक्ति यह जानते हुए भी अपनी ढिटाई पर अड़ा रहता है कि वह गलती पर है। फिर आए दिन झूठ को सच दिखाने कि इस प्रयास को देख कर यही लगता है कि अमुक चैनल बिक चुका है अौर अमुक चैनल सत्तारूड़ दल की रखेल है! महाशय आप बुरा न मानें, रखेल से बी नीच यदि कोई शब्द मेरी जान कारी में होता तो मैं वही लिखता।

आज के चर्चा पहले से ही गठित होते हैं। कौन लड़ेगा, अौर किस को जीतना हे यह सेट पर उपस्थित अतिथि गण को भी पता होता है, अौर दर्शक गण तो ख़ैर अब चालाक हो चुके हैं, उन्हें भी पता चल ही जाता है कि इस का अंत क्या होगा।

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