Wednesday, July 13, 2016

हाय रे ये दोगलापन

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वाह रे मीडिया! 
बहुत सुनते थे कि एक झूट को सौ बार बोलो तो वह सच होजाता है। परंतु इसका जीता जागता उदाहरण भी देख लिया। 
ज़ाकिर नाइक के विषय में इतना झूट बोला गया कि अच्छे सेक्यूलर सोच रखने वाले कुछ लोग भी बहक गएे।

Image Source: www.unique-design.net


नैं इसे क्या कहूं? मीडिया का दोग़लापन या फिर उसका असली चेहरा? 
मैं एक बात साफ कर दूं कि आज भी मीडिया में अच्छे लोग हैं।  जो अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाना चाहते हैं। अौर कुछ लोग निभा भी रहे हैं। लेकिन कुछ इमानदार पत्रकार एेसे भी हैं कि जिन की ईमानदारी की मिसालें दी जा सकती हैं। लेकिन बहुत ईमानदार एेसे भी हैं जिन्हें उनकी ईमानदारी की भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है। या तो उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ती है या फिर गुमनाम होकर जीवन यापन करना पड़ता है। यहां मैं तमाम उन पत्रकारों अौर मीडिया कर्मियों को सलाम करता हूं। 

मुझे तो उन पत्रकारों से आपत्ति है जिन्होंने चंद तुच्छ कौड़ियों के बदले अबना धर्म अौर कर्तव्य को बेच डाला है। जिन्होंने कुछ खोटे सिक्कों के बदले सत्य को बेच कर केवल झूट खरीदा है। जी हां जिन्होंने पैसों की लालच में अपना क़लम अौर अपनी ज़बान तक का सौदा कर लिया है। 

पैसों के लिए वह देश वासियों को तोड़ कर आपस में शत्रुता भी पैदा कर देते हैं। यह सब पैसे का खेल है साहेब। कल जो मीडिया सत्तारूड़ दल के गन गाती थी। अौर विपक्षी दल की धज्जियां बिखेर देती थी, आज वही मीडिया बदल चुकी है। कल का गुंडा आज मसीहा बन चुका है। अौर जो मसीहा था आज मीडिया के करम से वही मुजरिम बन गया है। 

बिके हुएे मीडिया का दोगला पन उस समय अौर साफ होगया जब मैं ने देखा कि एक झूटी खबर के आधार पर अमन के लिएे संघर्ष करने वाले एक व्यक्ति को आतंकवादी अौर देशद्रोही तक कह डाला। पर वही मीडिया मासूम मां बहनों को धोका देकर उनके साथ दुष्कर्म करने वाले को अौर देशद्रोह के जुर्म में जेलों बंद लोगों आज भी सम्मान से याद करता है।

पैसे मिलने पर एक छोटी सी घटना को आतंक से जोड़ सकते हैं। वहीं पैसे का यह खेल भी देखें कि बम ब्लास्ट में प्रमाण होने के बाद भी उनको हाइलाइट नहीं किया जाता है। 
घटनास्थल पर टोपी, डाढ़ी, मिसवाक आदि मिल जाए तो किसी विशेष धर्म की धज्जियां बिखरने में ज़रा भी समय नही लगता। परंतु जब पता चल भी जाता है कि यह वसतुएं नक़ली थीं, अौर ये कोइ मुहम्मद, उमर या अब्दुल्ला नही बल्कि साधू, पुरोहित अौर साधवी हैं तो किसी भी मीडिया को यह उचित नहीं लगता कि जो गलत संदेश देशवासियों तक गया है उस का खण्डन करें।
अब जब पैसा ही इसी बात का मिलता है तो क्यों करेंगे?! अौर एसा होगया तो फिर हिंदू-मुसलिम तो एक दूसरे के क़रीब आजाएंगे। अौर यदि यह होगया तो फिर इन को पैसा देने वाले खुदाअों की दुकान बंद हो जाएगी। 

मैं किसी का नाम नहीं ले सकता, आप खुद समझदार हैं, समझ जाइए।


✒ ज़फ़र इब्ने नदवी



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